“खामोश हौसलों की आवाज़”

खामोश हौसलों की आवाज़”

 गाँव का नाम था – बसंतपुर। बाहर से देखने पर यह गाँव बिल्कुल साधारण लगता था, लेकिन इस गाँव की गलियों में कुछ ऐसे सपने पलते थे, जिनकी आवाज़ कभी किसी ने ठीक से सुनी ही नहीं थी। इन्हीं गलियों में रहता था अमन। अमन कोई खास नहीं था। न उसके पास महँगे कपड़े थे, न मोबाइल, न ही बड़ी-बड़ी बातों का हुनर। बस उसके पास था एक छोटा-सा कमरा, एक टूटी मेज, एक पुरानी कुर्सी और दीवार पर टँगी माँ की एक मुस्कुराती हुई तस्वीर। उसकी माँ – सीमा देवी। सीमा देवी अब इस दुनिया में नहीं थीं। लेकिन अमन की पूरी दुनिया उन्हीं से शुरू होकर उन्हीं पर खत्म होती थी। 



   
 अमन सुबह चार बजे उठ जाता था। गाँव अभी सोया रहता, मुर्गे भी पूरी तरह नहीं बोलते थे। वह बिना किसी आवाज़ के उठता, दीया जलाता और सबसे पहले माँ की तस्वीर के सामने खड़ा होकर धीरे से बोलता— “माँ… आज भी कोशिश करूँगा।” बस इतना ही। कोई लंबी प्रार्थना नहीं, कोई बड़ा वादा नहीं। सिर्फ कोशिश। --- अमन की माँ सिलाई का काम करती थीं। गाँव की औरतों के कपड़े सीतीं, बच्चों की स्कूल ड्रेस ठीक करतीं और जो भी थोड़ा-बहुत मिलता, उसी में अमन को पढ़ाती थीं। लेकिन एक दिन अचानक बीमार पड़ गईं। अस्पताल बहुत दूर था, पैसे कम थे और समय बहुत तेज़ भाग रहा था। सीमा देवी की साँसें धीरे-धीरे थम गईं। और उसी के साथ अमन का सहारा भी। --- उस दिन के बाद अमन बदला नहीं। बस चुप हो गया। बहुत ज़्यादा चुप।

 पिता पहले ही दुनिया छोड़ चुके थे। अब घर में सिर्फ अमन था। लोगों ने कहा— “अब पढ़ाई छोड़ दे, कुछ काम कर ले।” “इतनी पढ़ाई करके क्या करेगा?” “गरीबी में सपने महँगे पड़ते हैं।” अमन सुनता था… लेकिन जवाब नहीं देता था। --- वह सुबह दूध की डेयरी पर काम करता। दोपहर को एक छोटी-सी दुकान पर सामान जमाता। शाम को खेतों में मजदूरी करता।




 और रात में… जब पूरा गाँव सो जाता… अमन अपनी किताबें खोलता। --- किताबें भी पूरी नहीं थीं। कुछ पन्ने गायब थे। कुछ पर पानी गिर चुका था। लेकिन उसके लिए वही सबसे कीमती चीज़ थीं। उसका सपना था— शिक्षक बनना। वह चाहता था कि किसी और बच्चे को ये न सुनना पड़े कि “पैसे नहीं हैं, इसलिए पढ़ाई छोड़ दो।” --- गाँव के स्कूल में एक नए मास्टर साहब आए थे – विनोद सर। पहले ही दिन उन्होंने क्लास में एक सवाल पूछा— “तुममें से कौन आगे चलकर कुछ बड़ा करना चाहता है?” कुछ बच्चों ने मज़ाक में हाथ उठा दिए। अमन ने नहीं उठाया। वह जानता था, उसका सपना बड़ा है… लेकिन उसकी हालत बहुत छोटी है। 
क्लास खत्म होने के बाद विनोद सर ने अमन को रोक लिया। “तुमने हाथ क्यों नहीं उठाया?” अमन थोड़ा घबरा गया। “सर… सपना तो है… लेकिन हालात…” विनोद सर कुछ देर चुप रहे। फिर बोले— “हालात हमेशा आज जैसे नहीं रहते। लेकिन जो हार मान लेता है… उसके हालात कभी बदलते भी नहीं।” अमन पहली बार किसी अजनबी से इतना सीधा सच सुन रहा था। --- उस दिन के बाद विनोद सर अमन पर खास ध्यान देने लगे। कभी एक्स्ट्रा सवाल, कभी कॉपी देखकर सलाह, कभी किताबें उधार। अमन को पहली बार लगा कि शायद कोई है… जो उसकी खामोशी सुन पा रहा है। --- लेकिन ज़िंदगी हमेशा परीक्षा लेती है। एक दिन दुकान से लौटते समय अमन को खबर मिली कि डेयरी वाला मालिक अब उसे काम पर नहीं रखेगा। “कोई और मिल गया है।” बस इतना ही। न कोई बहस, न कोई सफाई। --- 

 उस रात अमन बहुत देर तक माँ की तस्वीर के सामने बैठा रहा। कमरे में अंधेरा था। दीया बुझ चुका था। और उसकी आँखों में पहली बार डर उतर आया था। “माँ… अगर मैं भी हार गया… तो आपका सपना कौन जिएगा?” वह रोया नहीं। बस आँखें बंद कर लीं। --- अगले दिन सुबह वह फिर उठ गया। चार बजे। जैसे रोज़ उठता था। क्योंकि उसे पता था— दुख छुट्टी नहीं लेता, तो हिम्मत क्यों ले? --- उसने खेतों में ज़्यादा काम पकड़ लिया। मजदूरी कम थी, थकान ज़्यादा। लेकिन किताबें उसने छोड़ी नहीं। --- इधर स्कूल में बोर्ड परीक्षा नज़दीक आ रही थी। फीस, फॉर्म, फोटो, कॉपी – सबके लिए पैसे चाहिए थे। अमन के पास आधे भी नहीं थे। वह कई दिन तक स्कूल नहीं आया। --- विनोद सर खुद उसके घर पहुँचे। टूटा दरवाज़ा, खाली बर्तन, एक कोने में किताबों का ढेर। सब कुछ बोल रहा था। बस अमन चुप था। --- 

 “तुम स्कूल क्यों नहीं आ रहे?” सर ने पूछा। अमन ने सिर झुका लिया। “सर… परीक्षा का फॉर्म…” वाक्य पूरा नहीं कर पाया। --- विनोद सर ने बिना कुछ कहे अपनी जेब से पैसे निकाले और मेज पर रख दिए। “यह उधार नहीं है।” अमन घबरा गया। “सर… मैं…” विनोद सर मुस्कराए। “यह एक भरोसा है। तुम्हारी मेहनत पर।” --- उस दिन अमन ने पहली बार महसूस किया— कोई उसे बोझ नहीं समझता। --- परीक्षा शुरू हुई। हर सवाल में उसे माँ का चेहरा दिखता था। हर पन्ने पर उसे अपनी थकान याद आती थी। लेकिन उसका हाथ नहीं रुका। --- रिज़ल्ट वाले दिन पूरे गाँव में शोर था। अमन चुपचाप स्कूल की नोटिस बोर्ड के सामने खड़ा था। भीड़ बहुत थी। नाम ढूँढना मुश्किल। --- अचानक पीछे से किसी ने जोर से कहा— “अमन! तेरा नाम… सबसे ऊपर है!” वह एक पल को समझ ही नहीं पाया। फिर खुद देखा। --- अमन कुमार – प्रथम स्थान उसकी आँखें भर आईं। लेकिन उसने सिर ऊपर करके माँ की तरफ देखा। मन में बस एक ही आवाज़— “माँ… आज कोशिश रंग लाई।” ---
 पूरा गाँव हैरान था। जिस लड़के को लोग मजदूर मानते थे, जिसे लोग बेबस समझते थे, वही लड़का सबसे आगे था। --- कुछ दिन बाद उसे छात्रवृत्ति मिली। फिर आगे की पढ़ाई का मौका। शहर का कॉलेज। नया रास्ता। नया डर। लेकिन अब उसके साथ उसका हौसला था। --- साल बीतते गए। अमन बदला नहीं। बस मजबूत होता गया। --- और एक दिन… बसंतपुर के उसी स्कूल में एक नया शिक्षक आया। सादा कपड़े, शांत आवाज़, आँखों में वही पुरानी चमक। --- पहली क्लास में उसने बच्चों से पूछा— “तुममें से कौन आगे चलकर कुछ बड़ा करना चाहता है?” इस बार एक छोटे-से लड़के ने डरते हुए हाथ उठाया। पीछे बैठी एक लड़की ने भी। धीरे-धीरे कई हाथ उठ गए। --- अमन मुस्कराया। फिर बोला— “सपना देखना आसान है… लेकिन उसे रोज़ बचाना… वही असली मेहनत है।” --- क्लास खत्म होने के बाद वह बाहर निकला। स्कूल के पुराने पेड़ के नीचे थोड़ी देर खड़ा रहा। आसमान की तरफ देखा। बहुत हल्की आवाज़ में बोला— “माँ… आपका बेटा हार नहीं माना।” हवा हल्के से चली। जैसे किसी ने सिर पर हाथ रख दिया हो। --- और उस दिन बसंतपुर की गलियों में एक नई आवाज़ गूँज रही थी— खामोश हौसलों की आवाज़।

कोई टिप्पणी नहीं

Blogger द्वारा संचालित.